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Wednesday, 10 May 2017

22 साल बाद जगत के सामने आया "बुरान"

22 साल बाद जगत के सामने आया "बुरान"

BUSINESS  INSIDER (INDIA) 16 JUN, 2015

1974 में रशिया (तब सोवियत युनियन/USSR के नाम से पहचाना जाता था ।) ने बुरान प्रोग्राम/BURAN के तहत अपना स्पेश शटल प्रोग्राम शुरू किया था । तब अमेरिका और सोवियत रशिया के बीच शीत युध्ध/cold war चल रहा था । दोनो देश एक दुसरे को परास्त करने के लिए सामरिक/strategic चाल चल रहें थे । बुरान प्रोजेक्ट इसी का एक हिस्सा था । 

सोवियत रशिया अमेरिका से पहले अपना महिला अवकाशयात्री स्पेश में भेजना चाहता था । इसी लिए बुरान प्रोजेक्ट के तहत स्पेश शटल प्रोग्राम शुरु किया था । 

Svetlana Yegenyevna Savitskaya 
स्पेश वॉक करने वाली पहली महिला
लेकीन, सोवियत रशिया ने अपना ये लक्ष्य बुरान प्रोजेक्ट के पहले लोन्च से चार पहले 1984 में पुरा कर लिया था । Svetlana Yegenyevna Savitskaya स्पेश वॉक करने वाली पहली महिला बनी ।


बुरान प्रोजेक्ट के तहत पहला और आखरी !! स्पेश शटल उड्ड्यन 1988 में हुआ था । सोवियत युनियन के पतन के बाद 1993 इस प्रोजेक्ट को छोड दिया गया । पहली उडान भरने वाला स्पेश शटल हैंगर के एक भाग गिरने से 2002 में तूट गया । 

वास्तव में ऐसा माना जाता है की, इस स्पेश शटल की डिझाइन सोवियत सिक्रेट पोलिसने NASA से चोरी की थी। इस प्रोजेक्ट में सोवियत युनियन ने 10 अबज से ज्यादा की पूंजी लगाई थी ।





हाल ही फोटोग्राफ़र  Ralph Mirebs ने इस स्पेश शटल के फोटोग्राफ अपने ब्लोग पर जगत के सामने रखे ।



(1) ये बुरान का हैंगर/Baikonur Cosmodrome
(2) दोनो स्पेश शटल इस फोटो में दिख रहे है ।
(3) तूटा हुआ स्पेश शटल
(4) स्पेश शटल के अंदर का नजारा जो बिलकुल NASA के स्पेश शटल जैसा है ।


Tuesday, 9 May 2017

आखिर नासाने अपना सुपर बलून अवकाश में भेजा...

आखिर नासाने अपना सुपर बलून अवकाश में भेजा...
RUTURE,26 APR,2017

ये बलून अवकाश गंगा में से पृथ्वी पर आते कोस्मिक कणो को खोज पाने के लिए खास डिझाईन किया गया है।


उडान के लिए तैयार विशाल बलून @ Wanaka Airport 25 April, 2017


एक फूटबोल मेदान के कद का सुपर बलून न्युजिलेंड से NASA  ने 26 अपैल, 2017 को अवकाशमें पहोंचाया है । ये बलून बाह्य अवकाश में 2-3 दफा घूमकर डेटा इकठ्ठे करेगा ।

इस प्रोजेक्ट की जानकारी देते हुए Angela Olinto(University of Chicago professor ने कहा, "ये बलून अवकाश गंगा में से पृथ्वी पर आते कोस्मिक कणो ने के खोज पाने के लिए खास डिझाईन किया गया है। कोस्मिक किरणों का उदभव आज भी एक रहस्य बना हुआ है । ये कोस्मिक कण आकाशगंगा में से आते है या कोई ब्लेक होल इन्हे छोड रहा है ? या पल्सार या और कुछ है ?"

न्युझिलेन्ड नासा के 2015 और 2016 ऐसे बलून प्रोग्राम में NASA का भागीदार रहा है ।


कोस्मिक कणो के अध्ययन में भारतीय वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई का योगदान महत्वपूर्ण है ।

Sunday, 8 June 2014

The 'Beast' Will pass on Today : एक बार और बच गये !!

1,000-feet wide 'beast' asteroid to fly by earth on Sunday
source : times of india
पृथ्वीवासीयों की किस्मत अच्छी है ! 1000 फीट चौडी एक उल्का हमारी पृथ्वी से 1.25 लाख कीलोमीटर दूर से  8 जून,2014 रविवार (आज) को गुजरेगी ।

इसकी रफतार 50,400 km प्रति कलाक है । अगर यह उल्कापिंड पृथ्वी पर टकराता है तो, कम से कम एक विकसित शहर को पुरी तरह नष्ट कर सकता है ।

इस उल्कापिंड की जानकारी NASA को 23 अप्रैल, 2014 में लगी है । जिसको 2014HQ124 नाम दिया गया है । जिसका निकनेम "Beast" रखा गया है । इस उल्कापिंड की पृथ्वी के साथ टक्कर की कोई संभावना नहीं है ।

Boundry :
शायद ब्रह्मांड में भी BJP का प्रचार पहोंच गया है । तभी तो यह उल्कापिंड भी देखने आया "अब की बार मोदी सरकार"


Sunday, 1 June 2014

SpaceX’s Dragon V2 ready to ferry : SpaceX का ड्रेगन V2 अवकाशयात्रीयो को ले जाने के लिए तैयार

source : newyorktimes.com, sciencedaily.org
2012 से रशिया की मदद से इन्टरनेशनल स्पेश स्टेशन (ISS) को हर महिने सामान पहोंचाने के लिए एक केप्सुल से बना शटल भेजा जा रहा है । ये शटल ISS के साथ जुड सकता है और फिर काम समाप्त होने के बाद उसे पृथ्वी की तरफ फेंक दिया जाता है । यह शटल पृथ्वी पर अपने पेराशुट से जमीन या पानी में उतर जाता है । नौसेना के जहाज से उसे वहां से बरामद कर लिया जाता है।

 ISS के साथ जुडा हुआ केप्सुल (2013) 

केप्सुल की पृथ्वी पर वापसी(2013)

अब SpaceX कंपनी ने उसी केप्सुल (यान)को आधुनिक रूप देते हुए, अंतरिक्ष में मालसामान एवं अवकाशयात्रीयो को भी ले जा सके इस प्रकार तैयार किया है । इस यान में एक साथ 7 अवकाशयात्री जा सकते है । इस यान के अपने रोकेट इन्जिंस है, जिनकी मदद से वह तैर सकता है । इस कारण यान अपने आप ISS के साथ जुड पाएगा । और पृथ्वी पर उतरने के समय इसी रोकेट इन्जिंस का उपयोग करके हेलिकोप्टर की तरह उसे इच्छित जगह पर उतारा जा सकेगा । ड्रेगन V2  के अंदर टच स्क्रीन कम्य्प्युट है, जिससे इस यान का संचालन नियंत्रीत किया जा सकता है।
 ड्रेगन V2 
यह ज्ञात हो की, कोलंबिया दुर्घटना के बाद NASA ने स्पेश शटल की ऊडान को बंध कर दिया है । अंतिम स्पेश शटल ‘डिस्कवरी’ को भी निवृत्त कर दिया है । ISS को सामान पहोंचाने के लिए रशिया की मदद ली जा रही है, अब, अमेरिकन प्राइवेट कंपनी SpaceX ने ड्रेगन V2 को ईजाद करके NASA के काम में मदद की है ।

‘Icarus’ spaceship : मानव जाति का आखरी पडाव “ इक्रस स्पेशशीप”

source : cbc news
वैज्ञानिक, आर्किटेक्ट और डिझानर का एक समूह स्पेशशीप के निर्माण में लगा है। इस स्पेशशीप-इक्रस- में मानव जाति 100 वर्षो तक अंतरिक्ष में जिंदा रह पाए इस प्रकार की सुविधा होगी ।



CBC रेडियो के एक कार्यक्रम में इस प्रोजेक्ट की जानकारी देते हुए विज्ञान पत्रकार टोरा कोचूर ने कहा,
टोरा कोचूर
“ यह स्पेशशीप 20 किलोमीटर लंबा नलाकार होगा । इस स्पेशशीप में हमारी पृथ्वी जैसा ही वातावरण होगा । एक साथ 50-500 मनुष्यों का इस में समावेश हो पाएगा । इसमें गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव होगा । इसमें वनस्पतियां उगाई जाएगी । इस स्पेश शीप का अपना इंजन होगा, जिससे यह शीप अंतरिक्ष में आगे बढता जाएगा।"


" अगर पृथ्वी पर भयंकर सुखा पड जाए, परमाणु युध्ध हो जाए, भयंकर उल्कापिंड का पृथ्वी पर प्रहार हो जाए... जैसी कई विषम परिस्थितिओ में यह स्पेश शीप मानव जाति का अंतिम आश्रय स्थान हो सकेगा । अगर अंतरिक्ष में कहीं दूसरी जगह बसने लायक जगह है, तो मानव जाति उस ग्रह पर पहोंचकर अपना घर बना सकती है । इस बीच अपने स्पेश शीप में आराम से अपने समुदाय में जिंदा रहेगी ।“

यह प्रोजेक्ट 2013 में शुरू हुआ है, और 2100 साल तक पूर्ण होने का अंदाज है । कुछ लाख साल बाद भी जब पृथ्वी पर जीवन के लिए विषम परिस्थितियां पेदा होगी । उस वक्त  स्पेशशीप-इक्रस- मानव जाति का अंतिम पडाव होगा ।

Friday, 23 May 2014

'LIVE' Supernova explosion : सुपरनोवा विस्फोट को live देखा गया

source : sciencedaily.com
ब्रह्मांड में 'वुल्फ-रायेट तारा' सबसे महाकाय होता है । हमारे सूर्य से यह तारा 20 गुना ज्यादा भारी होता है  और सूर्य से 5 गुना ज्यादा गर्म होता है ।ब्रह्मांड में ऐसे तारे कम दिखने को मिलते है । जिसके कारण खगोल वैज्ञानिको के पास इनके बारें में ज्यादा जानकारी नहीं थी।

iPTF प्रणाली :
लेकिन,   intermediate Palomar Transient Factory (iPTF)  की मदद से ब्रह्मांड के किसी भी कोनें में अगर कोई भी घटना होने वाली है तो तुरंत उसका अद्ययन किया जा सकता है ।  यह कम्प्युटर से संचालित प्रणाली पुरे ब्रह्मांड का ब्योरा रखती है । जहां भी कोई अजीब सी घटना होने की संभावना है तो तुरंत पृथ्वी पर स्थित नियंत्रण कक्ष को संकेत भेजती है ।
 
iPTF  प्रणाली की वजह से ही वैज्ञानिको को जानकारी मिली की, 360 लाख प्रकाश वर्ष दूर एक  'वुल्फ-रायेट तारा' प्रचंड सुपरनोवा - llb supernova - बन रहा है । iPTF  प्रणाली का उपयोग करते हुए विझमन इन्स्टियूट (ईजरायल) के वैज्ञानिक ने इस सुपरनोवा -2013cu  को उसके विस्फोट के कुछ घंटो के पहले ही देख लिया। उन्हों ने जमीन से टेलिस्कोप से इस तारें का 5.7 घंटो तक अद्ययन किया । और उसके विस्फोट के पश्चात 15 घंटो तक उसका अद्ययन किया ।

तारें की जन्म कुंडली :
(a) ब्रह्मांड में हाइड्रोजन गेस के बीच गुरुत्वीय आकर्षण होने पर तारा बनने का प्रारंभ हुआ
 (b), (c)  गुरुत्वीय आकर्षण प्रबल होने पर तारें के केन्द्रिय भाग में केन्द्रिय संलयन (nuclear fusion) प्रक्रिया शुरू होती है ।
 (d) गुरुत्वीय आकर्षण और बहारी उर्जा का दबाव संतुलित होने पर तारा चमकता है । हमारा सूर्य इस अवस्था में है ।
(e) गुरुत्वीय आकर्षण चालु रहता है मगर केन्द्रिय भाग में हाइड्रोजन गेस खत्म हो जाने के कारण असंतुलन पेदा होता है ।
(f) अंत हमारे सूर्य से बहोत बडे तारें में सुपरनोवा विस्फोट के साथ उपरी सतह दूर हो जाती है ।

'वुल्फ-रायेट तारा' और सुपरनोवा क्या है ?
सभी तारों में केन्द्रिय संलयन (nuclear fusion) प्रक्रिया से हाइड्रोजन परमाणु का हिलीयम में रूपांतर होता है । तारे में जितना ज्यादा हाइड्रोजन गेस होगा, उतना उसके केन्द्रिय भाग में गुरुत्वीय संकोचन ज्यादा होगा । उतनी केन्द्रिय संलयन प्रक्रिया तेज होगी ।
जब तारे के केंद्र में हाइड्रोजन गेस खत्म हो जाती है तो, कार्बन, ओक्सिजन, नियोन, सोडियम जैसे भारी तत्वो का संलयन शुरू होता है । तारें का केन्द्रिय भाग आर्यन का बन जाए तब तक यह प्रक्रिया चालु रहती है ।

अब भी केन्द्रिय भाग का गुरुत्वीय संकोचन चालु रहता है और अंत में प्रोटोन और इलेक्ट्रोन मिल जाते है । जिसके बाद तारे में विस्फोट हो जाता है । उस समय बहोत सारी ऊर्जा ब्रह्मांड में चारो तरफ बिखरती है । इस विस्फोट को 'सुपरनोवा' कहते है । हमारा सूर्य 100 साल में जितनी ऊर्जा फेंकता है उतनी ऊर्जा सुपरनोवा विस्फोट से प्रति सेकंड मुक्त होती है !! तारा सुपरनोवा के पहले जो अवस्था प्राप्त करता है उसे 'वुल्फ-रायेट तारा' कहते है । जिसमें सुपरनोवा विस्फोट से पहेले एक प्रकार का वायु प्रवाह देखने को मिलता है । जिसमें तारे से द्रव्य बहार बहने लगता है ।


iPTF  प्रणाली की वजह से इस प्रकार सुपरनोवा -2013cu का live अद्ययन हो पाया है । iPTF  प्रणाली की मदद से अब ब्रह्मांड की कई घटनाओं को live देख पायेंगे ।

Monday, 19 May 2014

Red spot of JUPITER will disappear: गुरु ग्रह का लाल धब्बा गायब हो रहा है!!?


source : www.cbc.ca
लाल धब्बे वाला (Red spot) ग्रह अगर पूछा जाए तो ज्यादातर लोगो का जबाब होगा "गुरू (Jupiter)"

लेकिन , रिसर्च से पता चला है की गुरू का ये लाल धब्बा धीरे-धीरे सिकुड रहा है।

गुरू ग्रह पृथ्वी से 11.2 गुना बडा है। हमारे सौर मंडल का सबसे बडा ग्रह है। खगोल वैज्ञानिको के लिए गुरू का 'लाल धब्बा (Red spot)' एक पहेली (mysterious puzzle) के समान है। जब वोयेजर-1 यान  गुरू के पास से गुजरा तब इस लाल धब्बे का रहस्य सुलझा।

Voyager -1
Red Gaint spot 
(magnified view)

ये लाल धब्बा (Red spot) एक तूफान है, जो 300 से अधिक साल से गुरू के वातावरण में घूम रहा है। गुरू ग़्रह पर 2% जितनी ही जमीन है । इस कारण इस तूफान का जोर अब तक कम नहीं हुआ है। इस की रफ्तार करीब 200 माईल प्रति घंटा है।

1995,2009,2014 में
हबल टेलिस्कोप से ली गई तस्वीरें
1800 में इस का कद (dimension) 41,000 किमी जितना था । (हमारे पृथ्वी के जितने 2-3 ग्रह इसमे समा सकते है!!!)
लेकिन, 2014 में इसका कद 16,500 किमी का ही रह गया है। इस का मतलब यह लाल धब्बा (Red spot) 900 किमी प्रति वर्ष की रफ्तार से  घट रहा है।

मिसेल वोंग (Micheal Wong, Scientist, University of California) बताते है की, "सभी खगोल वैज्ञानिकों के लिए लाल धब्बे (Red spot) का सिकुडना एक रहस्यमय घटना है। अगर इस रफ्तार यह घटना चालु रही तो अगले 17 साल में लाल धब्बा (Red spot) पुरी तरह गायब हो जाएगा।"

Sunday, 18 May 2014

NASA : "छोटे स्पेश ट्रावेर्ल्स" मंगल पर बस सकते है।

Source : CBC News
हमने बहोत सारे होलीवुड मुवी में देखा है की, इन्सान मंगल ग्रह पर उतरते है। फिलहाल वैज्ञानिको का एक दल जीवन को मंगल ग्रह पर पहुंचाने और उसे स्थाई करने के लिए प्रयोग कर रहा है।

यह प्रयोग ISS इन्टरनेशनल स्पेश स्टेशने में बैक्टेरीया पे हो रहे है। अभी तीन रिसर्च पेपर पर विचार विमर्श जारी है। ये खोज पेपर  "Survival of Bacillus Pumilus Spores for a Prolonged Period of Time in Real Space Conditions",  "Resistance of Bacterial Endospores to Outer Space for Planetary Protection Purposes" और "Survival of Rock-Colonizing Organisms After 1.5 Years in Outer Space,"।

ज्यादातर देखा गया है की, सजीव पदार्थ नई परिस्थितीओं में जल्दी से अनुकूलित न हो पायें तो अंत में उसकी मृत्यु निश्चत है। यदी हम मंगल ग्रह पर जाने की सोच रहे है तो पहेले बाह्य अंतरिक्ष और स्पेश शटलमें में "जीवन" की अनुकूलन क्षमता को जाँच लेना चाहिए।

हाल ही में मंगल पहुंचे यानों ने दी हुई माहिती के अनुसार मंगल पर बैक्टेरिया के जीने के लिए अनुकूल माहोल है। बीजाणुं (spores) बनाने वाले बैक्टेरीया मंगल पहुंचाने वाले यान में तथा मंगल के वातावरण सही तरीके से जिंदा रह सकते है।

कस्थुरी जे. वैंकटरामन, (उपर बताई हुए तीनों खोज पत्र में सहसंशोधक, Biotechnology and Planetary Protection Group, NASA's Jet Propulsion Laboratory), ऊन्हों नें समझाया की," मंगल पर उतरतें समय यान बहोत गरम हो जायेगा ऐसी विषम परिस्थितियों में भी सजीव जिंदा रहे एसी व्यवस्था करनी पडेगी।


The European Technology Exposure Facility (EuTEF) attached to the Columbus module of the International Space Station during orbital flight.
इन्टरनेशनल स्पेश स्टेशन की प्रयोगशाला The European Technology Exposure Facility (EuTEF)(see the picture) में ऐसी विषम परिस्थितियों में ज्यादातर बैक्टेरीया के बीजाणु (spores) 30 मिनीट में ही नष्ट हो गये। लेकिन Bacillus pumilus SAFR-032 (बेसीलस पुमिलस-SAFR-032 )‌ के बीजाणु (spores) 18 महिने तक जिंदा रहे ।"

एक और बैक्टेरीया की जाती Bacillus subtilis-168 (बेसीलस सबटिलीस-168 )‌ है, जिसका जिक्र दुसरे रिसर्च पेपर में किया है। लेकिन यह बैक्टेरीया अंतरीक्ष यान में उपयोग में आने वाली ऐल्युमिनियम (Al) की विषकारक असर से मर गए ।

तीसर रिसर्च पेपर में पथ्थरों में पायें जाने वालें बैक्टेरीया को अंतरीक्ष यान से मंगल पर भेजने के बारें में बताया गया है। उस पत्र के मुताबिक जैसे पृथ्वी पर धुम्रकेतु (comet) या उल्कापींड के टकराने के बाद उसके टुकडों में रहे बैक्टेरिया से जीवन शुरूआत हुई । ठीक वैसे ही हम ऐसे rock-colonizing cellular organisms (पथ्थरों में पायें जाने वालें बैक्टेरीया) को मंगल पर भेज सकते है। प्रयोगो से ये साबित हुआ है की ऐसे बैक्टेरीया 1.5 वर्ष तक जिंदा रहते है।

HAPPY MOTHER'S DAY : मधर डॅ का इतिहास जाने

मधर डॅ का इतिहास :- प्राचीन समय में ग्रीकवासी क्रोनस की पत्नी और समग्र देवताओं की माता "रिहा" (Rhea)‌ को आदर देने के लिए मधर ड...