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Thursday, 25 May 2017

Self Cleaning Clothes…'स्वयं साफ होनेवाले कपडें...

Self Cleaning Clothes…'स्वयं साफ होनेवाले कपडें...


एक नूर आदमी... हजार नूर कपडे...

कपडे हर एक के व्यक्ति के स्वभाव का आइना है । हम नए कपडे पहन के अपने आप को उर्जावान और आकर्षक समझते है । लेकिन ये कपडे हर दो-चार दिन में मैले हो जाते है । उन्हें धोना पडता । लेकिन, जल्द ही हमें ये झंझट से मुक्ति मिल जाएगी । क्योंकी..... वैज्ञानिकोंने ऐसे कपडे ढूंढ निकाले है । जो अपने आप ही साफ़ हो जाएगें । भारत के ARCI(International Advanced Research Centre for Powder Metallurgy, Hydrabad) के वैज्ञानिकोने इस पर शोध करते हुए ऐसे कपडे बनाए है जो सूर्य प्रकाश में अपने आप साफ हो जाएगें । ये संभव हुआ है नेनो टेक्नोलोजी के कारण !

स्वयं साफ होनेवाले कपडों के रेशों पर TiO2 या ZnO के नेनो कणों का पड चढाया जाता है। TiO2 (टिटेनियम ऑक्साइड) एक शक्तिशाली प्रकाश क्रियाशिल उत्प्रेरक/photocatalyst है | जब कपडें को सूर्य प्रकाश में रखते है तब TiO2 के साथ प्रकाश रासायणिक क्रिया होने से हाइड्रोक्सील मुक्तमुलक/OH· और ऑक्सिजन/O2· मुक्तमुलक बनता है । कपडें पर जमा हुआ मैल, पसीना, धूल-मिट्टी, बैक्टेरिया आदि (कार्बनिक पदार्थ) इनके साथ मिलकर कार्बन डायोक्साइड/CO2 और पानी/H2O के स्वरुप में सतह से दूर हो जाते है । इस प्रकार कपडें की सतह से अपने आप दाग‌-धब्बें दूर हो जाएगें।
'स्वयं साफ होने वाले कपडों' के रेशों पर TiO2 या ZnO के नेनो कणों का पड होने के कारण ये कपडें पानी प्रतिरोधी/water resistant होते है ।  इन कपडों में नेनो सिल्वर के उपयोग से ये कपडे एन्टिबैक्टेरियल हो जाते है ।

रासायणिक प्रक्रिया :

जब सूर्यप्रकाश TiO2 पर पडता है तब इलेक्ट्रोन्स उसके संयोजकता पट/valance band से कूदके वाहकता पट/conduction band में आ जाते है । TiO2  की सतह पर एसे कई इलेक्ट्रोन्स और उसके छिद्र बन जाते है । O–2 और इलेक्ट्रोन्स से जुडकर ऑक्सिजन वायु/O2· मुक्तमुलक बनाते है । इलेक्ट्रोन्स के छिद्र, पानी/H2O के साथ मिलकर हाइड्रोक्सील मुक्तमुलक/OH· बनाते है । ये दोनों मुक्तमुलक अतिक्रियाशिल होने के कारण तुरंत मैल, पसीना, धूल-मिट्टी, बैक्टेरिया आदि (कार्बनिक पदार्थ) साथ मिलकर कार्बन डायोक्साइड/CO2 और पानी/H2O  बना देते है ।
स्वयं साफ होने वाले कपडों के फायदे :

Self Cleaning Sport Wear
❉धूप में खडे रहने से ये कपडें साफ हो जाते है, इसलिए कपडों की धुलाई का खर्चा कम हो जाएगा।


❉हवाई जहाज, स्पेश क्राफट में बैठे लोग बिना कपडें बदले लंबे समय तक अपना काम कर सकते है ।

❉जिन लोगों के पसीने के कारण कपडों-मोझों में से बदबू आती है, उनके लिए ये कपडें ज्यादा फायदेमंद है ।

❉डोक्टरो को आपने मास्क को बारबार साफ करने से मुक्ति मिल जाएगी ।

❉बार बार कपडे धोने से उसकी चमक कम हो जाती है, लेकिन स्वयं साफ होने वाले कपडों को बार धोना नहीं पडेगा इसके कारण ये कपडे लंबे समय तक नए जैसे बने रहेंगे ।

❉ये कपडे पानी प्रतिरोधी/water resistant होने के कारण ये पानी से जल्दी भीगते नहीं है । कॉफी, चाय, खाने के 
तेल या कीसी रंग का धब्बा इन पर नहीं पडता है ।
Self Cleaning Denim
Boundry :

छोटी चींकी ने ये पढके कहा,  "चलो अच्छा है... मम्मी बाहर धुप में खेलने में मना नहीं करेगी ।"

Tuesday, 9 May 2017

आखिर नासाने अपना सुपर बलून अवकाश में भेजा...

आखिर नासाने अपना सुपर बलून अवकाश में भेजा...
RUTURE,26 APR,2017

ये बलून अवकाश गंगा में से पृथ्वी पर आते कोस्मिक कणो को खोज पाने के लिए खास डिझाईन किया गया है।


उडान के लिए तैयार विशाल बलून @ Wanaka Airport 25 April, 2017


एक फूटबोल मेदान के कद का सुपर बलून न्युजिलेंड से NASA  ने 26 अपैल, 2017 को अवकाशमें पहोंचाया है । ये बलून बाह्य अवकाश में 2-3 दफा घूमकर डेटा इकठ्ठे करेगा ।

इस प्रोजेक्ट की जानकारी देते हुए Angela Olinto(University of Chicago professor ने कहा, "ये बलून अवकाश गंगा में से पृथ्वी पर आते कोस्मिक कणो ने के खोज पाने के लिए खास डिझाईन किया गया है। कोस्मिक किरणों का उदभव आज भी एक रहस्य बना हुआ है । ये कोस्मिक कण आकाशगंगा में से आते है या कोई ब्लेक होल इन्हे छोड रहा है ? या पल्सार या और कुछ है ?"

न्युझिलेन्ड नासा के 2015 और 2016 ऐसे बलून प्रोग्राम में NASA का भागीदार रहा है ।


कोस्मिक कणो के अध्ययन में भारतीय वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई का योगदान महत्वपूर्ण है ।

Monday, 2 June 2014

IMPULSE 2 : सोलार प्लेन इम्प्ल्स 2 वर्ल्ड टूर के लिए तैयार..

source : BBC.com
सोलार पावर से चलनेवाला "इम्प्ल्स 2" वर्ल्ड टुर के लिए तैयार है ।

इम्प्ल्स(2013)
पिछ्ले साल, मई, जून, जुलाई-2013 में इस प्लेन ने पुरे अमेरीका- सान फ्रान्सिस्को से न्युयोर्क तक-का सफर बिना रुके और बिना ईंधन डलवाए पूर्ण किया है ।इस सफर के साथ इस प्लेन ने कई रिकोर्ड्स अपने नाम कर दिए है ।





 इम्प्ल्स(2013)
सबसे लंबे समय तक हवा में ऊडने वाला (26 घंटे) पहला समानव सोलार प्लेन का रिकोर्ड,
दो द्विपो के बीच सबसे लंबी दूरी तय करने वाला पायलोट सहित सोलार प्लेन का रिकोर्ड इसके नाम हो गया ।




कैसा है "इम्प्ल्स" ?

 "इम्प्ल्स 2"
यह विमान के पंख कार्बन फायबर से बने है । जिनका फैलावा बोईंग 747 प्लेन से भी ज्यादा है। फिर भी, इस प्लेन का वजन (2.3 टन) एक सामान्य कार जितना ही है ! इसके पंखो पर करीब 17,000 सोलार सेल लगे है । जो इसकी ब्रशलेस मोटर को ऊर्जा देते है । इसकी अधिकत्तम स्पिड 140 km/h  है । दिन के समय इसकी लिथियम आयन बैटरी सोलार ऊर्जा से चार्ज होती है । रात के समय यही बैटरी की मदद से प्लेन उडता रहता है ।

पिक्कार्ड और बोर्शबर्ग ने "इम्प्ल्स" प्लेन में कुछ सुधार करके उसको वर्ल्ड टूर के लिए तैयार किया है । 2015 में "इम्प्ल्स 2" प्लेन पुरी पृथ्वी का चक्कर लगाके एक विश्व विक्रम बनाने जा रहा है ।
Best of Luck to Impulse 2's Team !!




Sunday, 1 June 2014

SpaceX’s Dragon V2 ready to ferry : SpaceX का ड्रेगन V2 अवकाशयात्रीयो को ले जाने के लिए तैयार

source : newyorktimes.com, sciencedaily.org
2012 से रशिया की मदद से इन्टरनेशनल स्पेश स्टेशन (ISS) को हर महिने सामान पहोंचाने के लिए एक केप्सुल से बना शटल भेजा जा रहा है । ये शटल ISS के साथ जुड सकता है और फिर काम समाप्त होने के बाद उसे पृथ्वी की तरफ फेंक दिया जाता है । यह शटल पृथ्वी पर अपने पेराशुट से जमीन या पानी में उतर जाता है । नौसेना के जहाज से उसे वहां से बरामद कर लिया जाता है।

 ISS के साथ जुडा हुआ केप्सुल (2013) 

केप्सुल की पृथ्वी पर वापसी(2013)

अब SpaceX कंपनी ने उसी केप्सुल (यान)को आधुनिक रूप देते हुए, अंतरिक्ष में मालसामान एवं अवकाशयात्रीयो को भी ले जा सके इस प्रकार तैयार किया है । इस यान में एक साथ 7 अवकाशयात्री जा सकते है । इस यान के अपने रोकेट इन्जिंस है, जिनकी मदद से वह तैर सकता है । इस कारण यान अपने आप ISS के साथ जुड पाएगा । और पृथ्वी पर उतरने के समय इसी रोकेट इन्जिंस का उपयोग करके हेलिकोप्टर की तरह उसे इच्छित जगह पर उतारा जा सकेगा । ड्रेगन V2  के अंदर टच स्क्रीन कम्य्प्युट है, जिससे इस यान का संचालन नियंत्रीत किया जा सकता है।
 ड्रेगन V2 
यह ज्ञात हो की, कोलंबिया दुर्घटना के बाद NASA ने स्पेश शटल की ऊडान को बंध कर दिया है । अंतिम स्पेश शटल ‘डिस्कवरी’ को भी निवृत्त कर दिया है । ISS को सामान पहोंचाने के लिए रशिया की मदद ली जा रही है, अब, अमेरिकन प्राइवेट कंपनी SpaceX ने ड्रेगन V2 को ईजाद करके NASA के काम में मदद की है ।

Tuesday, 27 May 2014

Nature Inspires Drones : छोटे 'ड्रोन' रोबोट



Source : Sciencedaily.com

ड्रोन विमान
अमेरिका का ड्रोन विमान अफगानिस्तान में अपने कारनामों के लिए सब जानते है। यह विमान बिना पाइलोट के उडता रहता है । उसका नियंत्रण जमीन पर स्थित एक कक्ष से किया जाता है । इस विमान में HD-कैमेरे लगे होते है । जिससे काफी ऊंचाई से भी साफ तस्वीरें ली जा सकती है ।

लेकिन, शहर के भीड-भाड वाले विस्तार में ड्रोन विमान का संचालन ठीक से नहीं हो पाता था । उसका कद भी बडा होने की वजह से नीची उडान में असफल रहते है ।

अब संशोधकोने कुदरत के छोटे सजीव से प्रेरणा लेते हुए इस समस्या हल ढुढने का प्रयास किया है ।

अलग अलग 14 संशोधक टीमोंने पक्षीओं, चमगादड, तीतली, मधुमख्खी जैसे प्राणी की शरीर रचना का
अध्यन करके छोटे उडनेवालें रोबोट बनाने का प्रोजेक्ट शुरू किया है । यह छोटे रोबोट शहरी भीड-भाड वालें विस्तारों से आराम से गुजर पायेंगे ।


रोबोट का महत्व :
जापान के अणुरिएक्टर के विस्फोट जैसी दुर्घटनाओं के समय यह रोबोट वहां भेजकर स्थिति का ब्योरा लिया जा सकता है । जासूसी के क्षेत्र में यह रोबोट ज्यादा काम में आ सकता है । इन रोबोट का अच्छा उपयोग ‘खोज अभियान’ और ‘बचाव अभियान’ में हो सकते है ।

23 May, 2014 को प्रदर्शित एक रिपोर्ट -Bioinspiration and Biomimetics-के अनुसार संशोधक टीमोंने अपने काम का प्रदर्शन किया। इस प्रकार के रोबोट्स हवा के तेज बहाव में स्थिर रहकर उड नहीं सकते । अभी रोबोटिक्स विज्ञान में काफी सुधार होने है । आशा रखते है की आने वाले सालों में छोटे – छोटे रोबोट्स सामान की डिलीवरी करते हुए हवा में उडते नजर आएगे ।

Wednesday, 21 May 2014

Self Clean Car : एक खुशखबर : 'सुपर आलसी' लोगों के लिए :"अब कार अपने आप ही साफ हो जाएगी।"

left side-सादा रंग;
right side-सुपर हाइड्रोफोबिक रंग
source : cbc.ca
NISSAN कंपनीने अपने एक प्रयोग में एक कार के आधे भाग को सादे रंग (paint) से और बाकी के आधे भाग को 'सुपर हाइड्रोफोबिक' (जलविरागी = जल के प्रति अनाकर्षित होने वाला) रंग से रंग दिया। इस कार को बरसाती ऋतु के माहोल में चलाया गया । तो जैसे हम फोटो में देख रहे है, ठीक वैसे ही जिस भाग पर सुपर हाइड्रोफोबिक रंग लगा है वो भाग साफसुथरा रहा। जबकी, सादे रंग वाला बाकी आधा भाग ज्यादा गंदा हो गया।

वैसे तो, सुपर हाइड्रोफोबिक रंग को 1977 में बनाया गया था । लेकिन उसका व्यापारीक उपयोग नहीं खोजा गया था । करीब एक साल से वैज्ञानिक इस रंग के व्यापारीक उपयोग के बारें प्रयोग कर रहे थे ।

कमल के पत्ते पर पानी के बिन्दु
सुपर हाइड्रोफोबिक 
रंग की सतह पर पानी के बिंदु
सुपर हाइड्रोफोबिक रंग :-
Nanex कंपनी के क्लाटोन बर्ग (Clayton Berg, Belgian-Canadian) ने कमल (Lotus) की पत्तियों का अध्ययन करके 'सुपर हाइड्रोफोबिक रंग' बनाया है । यह रंग को बनाने में नेनोटेक्नोलोजी का उपयोग हुआ है । 
 (b) सतह से सरकता पानी अपने
साथ कचरा भी ले जाता है।

इस रंग के तंतु (fibers) बहोत नजदीक होते है। जिससे पानी-धूल के कण उसके भीतर घूस नहीं पाते । कमल के पत्ते पर जैसे पानी के बिन्दु बन जाते है । वैसे ही इस रंग की सतह पानी के बिन्दु बन जाते है और  तेज हवा से कार की सतह पर सरकते हुए अपने साथ धूल-मिट्टी भी ले जाते है । इस तरह कार अपने आप साफ-self clean-हो जाती है ।

हालांकी, NISSAN कंपनी ने अपनी कोई भी नई कार पर इस रंग को लगाने की बात नहीं की है । फिर भी, अब वो दीन दूर नहीं NISSAN कंपनी अपनी नई कार में ग्राहको को 'सुपर हाइड्रोफोबिक रंग' का विकल्प देगी । इस रंग का उपयोग अन्य चीज-वस्तुओं - कपडें, फर्निचर - में भी किया जा सकता है ।

Sunday, 18 May 2014

वैज्ञानिकों ने रोगग्रस्त ऊतकों(tissues) को निशाना बनाने के लिए nanovehicle विकसित किया

Source : esciencenews.com
एक ताजा अध्ययन के अनुसार, दो भारतीय वैज्ञानिकों ने अन्य स्वस्थ अंगों को प्रभावित किए बिना  रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) को विशेष दवाईयां देने के लिए "gold nanovehicle" विकसित किया है |

American Association of Pharmaceutical Scientists द्वारा प्रकाशित, AAPS PharmSciTech जर्नल में  दिल्ली विश्वविद्यालय के Dr. Subho Mozumdar, और कोलंबिया विश्वविद्यालय(अमेरिका) के Dr. Arnab De के सहयोगात्मक प्रयास से "The extraordinary proof-of-concept study"  अंतगर्त नेनो ड्रग्स (दवाईयां) की लागत को कम करने का अध्ययन किया है।

इस अध्ययन अनुसार "nanovehicle synthesising की लागत  $ 1 (60 रु.)प्रति मिलीग्राम  हो सकती है।

अमेरिकी पेप्टाइड सोसायटी द्वारा युवा अन्वेषक पुरस्कार से सम्मानित, Dr. Arnab De ने समझाया की, "नेनो व्हिकल का उत्पादन खर्च ज्यादा हो सकता है, लेकिन नेनो पार्टिकल्स का पृष्ठफल ज्यादा होने के कारण नेनो थेरापी में कम मात्रा में उपयोग किया जाता है। इस प्रकार दवाईयों का खर्च कम हो जाता है।"

आगे उन्होंने कहा," नेनो दवा स्वस्थ अंगों को बिना हानि पहुंचाए रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) को सीधा लक्ष्य बनाती है। जिससे नेनो दवा की साइड इफेक्ट नहीं होती है। वर्तमान समय में उपलब्ध दवाईयां को बिना स्वस्थ अंगो को असर किए सीधा रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) तक पहुंचाना संभव नहीं है।"

डॉ. Subho Mozumdar ने कहा : "हमने Nanovehicle के पृष्ठफल को tissue-ligand  molecules (पेशी-लिगेन्ड अणु) और ड्रग्स के साथ काम करने के लिए काफी परिवर्तित किया है। "
"Tissue-ligand molecules (पेशी-लिगेन्ड अणु) खास रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) को लक्ष बनाते हुए Nanovehicle  को रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) की तरफ ले जाते है। जहां Nanovehicle के साथ जुडी हुई दवा मुक्त हो जाती है। इस तरह दवा सीधी रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) असर करती है।"

लेकिन, डॉ Dr. Arnab De चेतावनी दी है की, "nanovehicle हमारी रोगप्रतिकारक प्रणाली (immunogenic concern) के साथ अनुकूलन हो जाएगा इसकी गारंटी नहीं है ।"

यह एक और संशोधन का विषय बन जाता है।

The Flying Car


Source : BBC News
अब वो दिन दूर नहीं जब लोगों के अपने निजी प्लेन्स होंगे।(हा, अभी भारत में ये संभव नहीं है! लेकिन ये विदेश की बात है।)

आज कल अमेरिकन सेना का ड्रोन विमान अपने कारनामो के कारण बदनाम है। लेकिन वही टेक्नोलोजी-"fly by wire"- अब Flying Car में काम आएगी। एक नियंत्रण कक्ष से इस उडती कार (Flying Car) का कम्प्युटर से नियंत्रण हो सकेगा।



इस प्रकार की कार की कई डिझाईन्स बनाई गई है। प्रायोगिक तौर पर उनका उत्पादन भी किया गया है। लेकिन लोगों में यह उतनी प्रचलित नहिं हुइ है।




लेकिन, अगर आप चाहें  कीसी जानेमाने कार उत्पादक से संपर्क करके अपनी निजी Flying Car (उडती कार) बनवा सकते है।

Wednesday, 14 May 2014

IPR,GANDHINAGAR (INDIA) का उर्जा क्षेत्र में वैश्विक और एतिहासिक योगदान

Source : Times Of India
लगता है, ऊर्जा का भविष्य "गुजरात" की कोख में पल रहा है !!

IPR, Gandhinagar
गांधीनगर के नजदिक स्थित IPR (इन्स्टियूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च) के वैज्ञानिको ने विश्व के हृदय समान प्रोजेक्ट, ITER (इन्टरनेशनल थर्मोन्युक्लियर ऐक्सप्रिमेन्ट रिएक्टर, Tokamak Reactor in France) में अपना सहयोग दीया है। ये वैज्ञानिक सहयोग से बनाने वाला विश्व का सबसे बडा रिएक्टर है। इस प्रोजेक्टकी मदद से भविष्य में थर्मोन्युक्लियर फ्युजन प्रकिया (परमाणुकेन्द्र संलयन, सूर्य और तारों में होनेवाली प्रक्रिया)से सस्ती, प्रदुषणमुक्त और सलामत उर्जा पेदा हो सकेगी।
भारत,  ITER में क्रायोस्टेट के 45 घटक और वेक्युम पात्र बनाकर पहुंचाने वाला है। जो इस प्रोजेक्ट के सबसे महत्वपूर्ण और बडे घटक (components) है। ये यंत्र सामग्री 2015 तक ITER, फ्रांस में पहुँच जायेगी। 2022-25 तक इस प्लांट में प्लाज्मा बन जाएगा और इसके बाद के समय में इस रिएक्टर (भठ्ठी) में हमारे सूर्य से 10 गुना ज्यादा तापमान पेदा हो जाएगा ।
Tokamak fusion reactor
Cadarache,France.

Diagram
Tokamak fusion reactor



भारत की महत्वपूर्ण उपल्ब्धि:-

अब भारत क्रायोजेनिक रिएक्टर के निर्माण करने वालें देशों में सामिल हो गया है। इस प्रोजेक्ट में सामिल Made in India रिएक्टर का वजन 23000 टन ( 3 एफिल टावर 
जितना !!!) है और इस में 840 क्युबिक मिटर  प्लाज्मा समा सकता है। डॉ. होमी भाभा, डॉ. विक्रम साराभाई, डॉ. अब्दुल कलाम का सपना अब साकार बनता नजर आ रहा है।



IPR का SST-1 काम कैसे करता है ?


इस रिएक्टर में चुंबकीय और विद्युतीय क्षेत्र की मदद से हाइड्रोजन प्लाज्मा को गरम किया जाता है। फिर अतिवाहक चुंंबक (super conducting magnet) से दबा कर हाइड्रोजन
प्लाज्मा में थर्मोन्युक्लियर फ्युजन प्रकिया (परमाणुकेन्द्र संलयन) शुरु की जाती है।

Saturday, 10 May 2014

वायरलेस बेटरी चार्जर : "cutting the cord"


मेनोस टेंजरीझ, Georgia Institute of Technology
प्रिंटेड वायरलेस चार्जर कोइल दीखा रहे है। 
Source : student.societyforscience.org
लेपटोप, मोबाइल फोन, टेबलेट, आईपॉड, गेमिंग डिवाईस आदी उपकरणों के लिए उसकी बेटरी मानो "आत्मा" के समान है। बेटरी को समय पर चार्ज करना यदी भूल गयें तो इन उपकरणों की तत्काल "हंगामी मृत्यु" हो जाती है।
बेटरी चार्ज करते समय भी इन उपकरणों को प्लग से ज्यादा दूर ले जा नहीं सकते । क्योंकी, पावर केबल (cord) की लंबाई सीमित होती है। कई जगह पे चार्जींग प्लेस हमारी पहोंच से दूर हो तो बेटरी चार्जिंग में तकलीफ होती है।अब ये नई टेक्नोलोजी हमें चार्जर, केबल और प्लग से छुटकारा दे सकती है । 
electric buses that charge their batteries
as they drive along their route in Gumi, South Korea.
Augest, 2013 Gumi-साउथ कोरीया की सडकों पर दो इलेक्ट्रिक बस दोडाई गई जिसमें कोर्डलेस बैटरी चार्जर था। इन बस की बेटरी को चार्ज करने के लिए कोई पावर सप्लाय नहीं चाहिए। इन बस की बेटरी उनके रास्ते में जमीन में दबाई हुई "चार्जिंग कोइल" से नीकलनेवाले विद्युत चुंबकीय तरंगो (electromagnetic waves) से चार्ज होती है।(see the diagram)



इ.सं. 1800 में निकोल टेसला ने "वायरलेस इलेक्ट्रीक सिग्नल" का विचार रखा था। उस समय ज्यादातर इन्डक्शन चार्जर 0.4 ईंच तक ही विद्युत तरंगो को पहुंचा सकते थे। उस समय की टेक्नोलोजी की सिमीतता के कारण "वायरलेस इलेक्ट्रीक सिग्नल"  विचार पूरी तरह संभव न हो पाया । 
वायरलेस चार्जिंग कैस काम करता है ?

कोरियन इंजीनियर्स ने प्रबल विद्युत सिग्नल्स को 3.3 फूट तक पहुचाने की व्यवस्था की है। इस के कारण कोरीयन बस को चार्ज कर पाना संभव हो पाया है।



फिलहाल, यह टेक्नोलोजी प्रांरभिक दौर में है।  Oak Ridge National Laboratory के वैज्ञानिक ऐसे प्रयास कर रहें है जिससे वायरलेस इलेक्ट्रीक सिग्नल ज्यादा शक्तिशाली और दूर तक प्रसार कर पायें । ज्यादा शक्तिशाली इलेक्ट्रीक सिग्नल बेटरी को जल्द रिचार्ज कर सकेंगे।

Wednesday, 7 May 2014

Green Jet Fuel : हवा और सूर्य प्रकाश में से बना ग्रीन जेट ईंधन

Source : Times Of India
युरोपियन वैज्ञानिको ने हवा और सूर्य प्रकाश से एक नया Green Jet Fuel (हरित विमान ईंधन) इजाद किया है।

वैसे तो CNG, हाइड्रोजन फ्युल सेल (ईंधन कोष), जेट्रोफा वनस्पति में से मिलता बायो डिजल आदि Green Fuel के तौर ज्यादा प्रसिद्ध किये गये है।

लेकिन यहाँ पे एक बिलकुल नए ईंधन की हम बात कर रहे है। युरोपियन वैज्ञानिको ने सोलार शक्ति का उपयोग करके Syngas (कार्बन मोनोक्साईड और हाइड्रोजन गेस का मिश्रण) बनाया । युरोपियन युनियन के इन वैज्ञानिको को मानना इस ईंधन के औद्योगिक ईंधन की समस्या का हल मिल सकता है।


green-jet-fuel
हालांकी, कार्बन मोनोक्साईड और हाइड्रोजन गेस का मिश्रण,  Water Gas (जल वायु) के नाम से आज भी औद्योगिक ईंधन के रूप इस्तमाल होता है। लेकिन यह वायु मिश्रण कोयले (coke) से या तो पेट्रोलियम से बनाया जाता है ।


जबकी युरोपियन वैज्ञानिको ने यह ईंधन सोलार शक्ति से उत्पादित किया है। संशोधको ने सोलार शक्ति को संक्रेन्द्रित करके 700° C  तक तापमान पेदा किया । जिससे [CO + H2] मिश्रण से Syngas पेदा किया। CO + H2 मिश्रण को केरोसीन (jet fuel) में परिवर्तित कर कार या तो बस में भी इस्तमाल किया जा सकता है। कार्बन मोनोक्साईड एक ग्रीन हाउस गेस है । इस तरह उसका उपयोग होने से ग्लोबल वोर्मिंग समस्या में राहत मिल सकेगी।
green-jet-fuel-2

फिलहाल तो वैज्ञानिकोने CO + H2 मिश्रण से एक ग्लास जितना ही केरोसीन (jet fuel) बनाया है। लेकिन, Maire Geoghegan-Quinn (मेर ज्योगन, European commissioner for Research, Innovation and Science) का मानना है की एक बडे सोलार रिएक्टर के इस्तमाल से 20,000 लिटर केरोसीन (jet fuel) प्रति दीन उत्पादन किया जा सकता है।

HAPPY MOTHER'S DAY : मधर डॅ का इतिहास जाने

मधर डॅ का इतिहास :- प्राचीन समय में ग्रीकवासी क्रोनस की पत्नी और समग्र देवताओं की माता "रिहा" (Rhea)‌ को आदर देने के लिए मधर ड...