Sunday, 18 May 2014

वैज्ञानिकों ने रोगग्रस्त ऊतकों(tissues) को निशाना बनाने के लिए nanovehicle विकसित किया

Source : esciencenews.com
एक ताजा अध्ययन के अनुसार, दो भारतीय वैज्ञानिकों ने अन्य स्वस्थ अंगों को प्रभावित किए बिना  रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) को विशेष दवाईयां देने के लिए "gold nanovehicle" विकसित किया है |

American Association of Pharmaceutical Scientists द्वारा प्रकाशित, AAPS PharmSciTech जर्नल में  दिल्ली विश्वविद्यालय के Dr. Subho Mozumdar, और कोलंबिया विश्वविद्यालय(अमेरिका) के Dr. Arnab De के सहयोगात्मक प्रयास से "The extraordinary proof-of-concept study"  अंतगर्त नेनो ड्रग्स (दवाईयां) की लागत को कम करने का अध्ययन किया है।

इस अध्ययन अनुसार "nanovehicle synthesising की लागत  $ 1 (60 रु.)प्रति मिलीग्राम  हो सकती है।

अमेरिकी पेप्टाइड सोसायटी द्वारा युवा अन्वेषक पुरस्कार से सम्मानित, Dr. Arnab De ने समझाया की, "नेनो व्हिकल का उत्पादन खर्च ज्यादा हो सकता है, लेकिन नेनो पार्टिकल्स का पृष्ठफल ज्यादा होने के कारण नेनो थेरापी में कम मात्रा में उपयोग किया जाता है। इस प्रकार दवाईयों का खर्च कम हो जाता है।"

आगे उन्होंने कहा," नेनो दवा स्वस्थ अंगों को बिना हानि पहुंचाए रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) को सीधा लक्ष्य बनाती है। जिससे नेनो दवा की साइड इफेक्ट नहीं होती है। वर्तमान समय में उपलब्ध दवाईयां को बिना स्वस्थ अंगो को असर किए सीधा रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) तक पहुंचाना संभव नहीं है।"

डॉ. Subho Mozumdar ने कहा : "हमने Nanovehicle के पृष्ठफल को tissue-ligand  molecules (पेशी-लिगेन्ड अणु) और ड्रग्स के साथ काम करने के लिए काफी परिवर्तित किया है। "
"Tissue-ligand molecules (पेशी-लिगेन्ड अणु) खास रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) को लक्ष बनाते हुए Nanovehicle  को रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) की तरफ ले जाते है। जहां Nanovehicle के साथ जुडी हुई दवा मुक्त हो जाती है। इस तरह दवा सीधी रोगग्रस्त ऊतकों (tissues) असर करती है।"

लेकिन, डॉ Dr. Arnab De चेतावनी दी है की, "nanovehicle हमारी रोगप्रतिकारक प्रणाली (immunogenic concern) के साथ अनुकूलन हो जाएगा इसकी गारंटी नहीं है ।"

यह एक और संशोधन का विषय बन जाता है।

The Flying Car


Source : BBC News
अब वो दिन दूर नहीं जब लोगों के अपने निजी प्लेन्स होंगे।(हा, अभी भारत में ये संभव नहीं है! लेकिन ये विदेश की बात है।)

आज कल अमेरिकन सेना का ड्रोन विमान अपने कारनामो के कारण बदनाम है। लेकिन वही टेक्नोलोजी-"fly by wire"- अब Flying Car में काम आएगी। एक नियंत्रण कक्ष से इस उडती कार (Flying Car) का कम्प्युटर से नियंत्रण हो सकेगा।



इस प्रकार की कार की कई डिझाईन्स बनाई गई है। प्रायोगिक तौर पर उनका उत्पादन भी किया गया है। लेकिन लोगों में यह उतनी प्रचलित नहिं हुइ है।




लेकिन, अगर आप चाहें  कीसी जानेमाने कार उत्पादक से संपर्क करके अपनी निजी Flying Car (उडती कार) बनवा सकते है।

NASA : "छोटे स्पेश ट्रावेर्ल्स" मंगल पर बस सकते है।

Source : CBC News
हमने बहोत सारे होलीवुड मुवी में देखा है की, इन्सान मंगल ग्रह पर उतरते है। फिलहाल वैज्ञानिको का एक दल जीवन को मंगल ग्रह पर पहुंचाने और उसे स्थाई करने के लिए प्रयोग कर रहा है।

यह प्रयोग ISS इन्टरनेशनल स्पेश स्टेशने में बैक्टेरीया पे हो रहे है। अभी तीन रिसर्च पेपर पर विचार विमर्श जारी है। ये खोज पेपर  "Survival of Bacillus Pumilus Spores for a Prolonged Period of Time in Real Space Conditions",  "Resistance of Bacterial Endospores to Outer Space for Planetary Protection Purposes" और "Survival of Rock-Colonizing Organisms After 1.5 Years in Outer Space,"।

ज्यादातर देखा गया है की, सजीव पदार्थ नई परिस्थितीओं में जल्दी से अनुकूलित न हो पायें तो अंत में उसकी मृत्यु निश्चत है। यदी हम मंगल ग्रह पर जाने की सोच रहे है तो पहेले बाह्य अंतरिक्ष और स्पेश शटलमें में "जीवन" की अनुकूलन क्षमता को जाँच लेना चाहिए।

हाल ही में मंगल पहुंचे यानों ने दी हुई माहिती के अनुसार मंगल पर बैक्टेरिया के जीने के लिए अनुकूल माहोल है। बीजाणुं (spores) बनाने वाले बैक्टेरीया मंगल पहुंचाने वाले यान में तथा मंगल के वातावरण सही तरीके से जिंदा रह सकते है।

कस्थुरी जे. वैंकटरामन, (उपर बताई हुए तीनों खोज पत्र में सहसंशोधक, Biotechnology and Planetary Protection Group, NASA's Jet Propulsion Laboratory), ऊन्हों नें समझाया की," मंगल पर उतरतें समय यान बहोत गरम हो जायेगा ऐसी विषम परिस्थितियों में भी सजीव जिंदा रहे एसी व्यवस्था करनी पडेगी।


The European Technology Exposure Facility (EuTEF) attached to the Columbus module of the International Space Station during orbital flight.
इन्टरनेशनल स्पेश स्टेशन की प्रयोगशाला The European Technology Exposure Facility (EuTEF)(see the picture) में ऐसी विषम परिस्थितियों में ज्यादातर बैक्टेरीया के बीजाणु (spores) 30 मिनीट में ही नष्ट हो गये। लेकिन Bacillus pumilus SAFR-032 (बेसीलस पुमिलस-SAFR-032 )‌ के बीजाणु (spores) 18 महिने तक जिंदा रहे ।"

एक और बैक्टेरीया की जाती Bacillus subtilis-168 (बेसीलस सबटिलीस-168 )‌ है, जिसका जिक्र दुसरे रिसर्च पेपर में किया है। लेकिन यह बैक्टेरीया अंतरीक्ष यान में उपयोग में आने वाली ऐल्युमिनियम (Al) की विषकारक असर से मर गए ।

तीसर रिसर्च पेपर में पथ्थरों में पायें जाने वालें बैक्टेरीया को अंतरीक्ष यान से मंगल पर भेजने के बारें में बताया गया है। उस पत्र के मुताबिक जैसे पृथ्वी पर धुम्रकेतु (comet) या उल्कापींड के टकराने के बाद उसके टुकडों में रहे बैक्टेरिया से जीवन शुरूआत हुई । ठीक वैसे ही हम ऐसे rock-colonizing cellular organisms (पथ्थरों में पायें जाने वालें बैक्टेरीया) को मंगल पर भेज सकते है। प्रयोगो से ये साबित हुआ है की ऐसे बैक्टेरीया 1.5 वर्ष तक जिंदा रहते है।

Search is 'ON' for rare PRIME NUMBERS : सबसे बडी अविभाज्य संख्या की खोज का प्रयत्न जारी.....

Source : phys.org
हमें गणित विषय में अविभाज्य अंक के बारे में बताया गया है। जिस संख्या को 1 और उस संख्या के बिना अन्य किसी संख्या से 'पूर्णत:' (शेष 0 हो ऐसे...) विभाजित न किया जा सके उस को अविभाज्य अंक कहते है।
>>उदाहरण :
5 को 1 और 5 के बिना किसी और संख्या से 'पूर्णत:' विभाजित नहिं कीया जा सकता। इसलिए 5 अविभाज्य अंक है।

2,3,5,7,11,13,... संख्याएँ अविभाज्य अंक के उदाहरण है।

अब सवाल है ...
सबसे बडी अविभाज्य संख्या कोन सी हो सकती है ? 

इन्डियाना स्टेट युनिवर्सिटी के प्रो. जेफ्फ एक्सो (Geoff Exoo, Mathematics and Computer Science)  और सहायक प्रो. जेफ्फ किन (Jeff Kinne, Mathematics and Computer Science) ने  सबसे बडी अविभाज्य संख्या खोजने का काम प्रारंभ किया है।
Mathematicians put their own spin on the search for rare prime numbers
उनका ध्यान सबसे बडे 'युग़्म अविभाज्य संख्या' (twin prime numbers, e.g. p and p + 2 likes 5 and 7, 7 and 9...etc) और 'सोफिया जर्मेन अविभाज्य संख्या' (Sophie Germain prime numbers, e.g. p + 2p + 1 likes 5 and 11, 11 and 23... etc) की खोज पर है।
उन्हों ने इन्टरनेट से जुडे 90,00,000 (90 लाख) कम्प्युटर्स को इस अविभाज्य संख्या की गणना में लगाया है। इस पद्धति को GIMPS (Great Internet Mersenne Prime Search) के नाम से जाना जाता है।

पिछले साल, डिसम्बर में इस टीम ने 14th सबसे बडी 'युग़्म अविभाज्य संख्या' (twin prime numbers) की खोज की है।

इसके अलावा इन्हों ने सबसे बडा 12th, 13th और18th 'सोफिया जर्मेन अविभाज्य संख्या' (Sophie Germain prime numbers), की भी खोज की है।

सबसे बडी अविभाज्य संख्या खोज की जरूर क्यों?

आधुनिक जमाने में बैकिंग, On-Line व्यापार, Internet Shopping जैसे क्षेत्र में कम्प्युटर और इन्टरनेट का उपयोग बढा है। व्यापारी वेब साइट एक खास प्रकार की सांकेतिक भाषा (Cryptographic Language) के इस्तमाल से अपने आर्थिक व्यवहार को सुरक्षित बनाती है।
यह सांकेतिक भाषा वास्तविक तौर पर दो अविभाज्य अंको गुणाकार होता है। जिसमें दो बडे अविभाज्य अंको को लेकर उनके गुणनफल से एक नया अंक मिकता है। जिसको सांकेतिक भाषा (Cryptographic Language) तौर पर उपयोग किया जाता है।

यदी आपको दो में से एक भी अविभाज्य अंक का पता नहीं है तो, इस नये अंक को विभाजित  (factorise) करने के लिए एक खास अल्गोरिधम बनाना पडता है । जो काफी कठिन और समय लेने वाला काम हो जाता है।

आधुनिक कम्प्युटर ज्यादा तेज गणना कर सकते है। ऐसे कम्प्युटर आसानी से सांकेतिक भाषा को सुलझा सकते है। इसलिए ज्यादा बडे अविभाज्य अंको की खोज जरूरी है।

बडी अविभाज्य संख्या खोज का इतिहास

1958 में खोजा गया सबसे बडा अविभाज्य अंक '6 अंको' का था।
1951में खोजा गया सबसे बडा अविभाज्य अंक '44 अंको' का था।
1953 में '687 अंको' वाला सबसे बडा अविभाज्य अंक खोजा गया।
1903  में खोजा गया सबसे बडा अविभाज्य अंक '39,751 अंको' का  बना था ।
1993 में '2,27,832 अंको' का और
2013 में '17 लाख अंको' का सबसे बडा अविभाज्य अंक खोजा गया।
मार्च, 2014 में प्रो. जेफ्फ एक्सो और प्रो. जेफ्फ किन ने 208th अविभाज्य अंक खोजा है। यह अविभाज्य अंक '7,12,748 अंको' से बना है।

इस अविभाज्य अंक को कागज पे लिखा जाए तो 1 माइल जितनी लंबाई का होगा!!!








Saturday, 17 May 2014

आर्जेन्टिना में से महाकाय (gaint) डायनासोर के अस्थि मिले

Source : BBC News
आर्जेन्टिना में पेन्टागोनिया के पश्विम में स्थित 'ला फ्लेन्चा' के रेगीस्तान से महाकाय डायनोसोर के  अश्मिभूत अस्थि मिले है।


इस डायनोसौर के कुल्हे की हड्डी के (thigh bone) माप से यह अंदाजा लगाया जाता है की, यह डायनोसोर 40 मिटर(13 फूट) लंबा और 20 मिटर (65 फूट) ऊंचा होगा। इस हिसाब से उसका वजन 77 टन (14 आफ्रिकन हाथी जितना!!) होगा । यह उस वक्त का सबसे महाकाय डायनोसोर हो सकता है।

वैज्ञानिको का मानाना है की, ये टिटानोसौर (titanosaur) की नयी जाति हो सकती है । इस जाति के डायनोसौर वनस्पतिहारी (herbivore) थे ।

Thursday, 15 May 2014

Dancing Frogs Found in India : "नृत्य करने वाले मेढक"


 new dancing frogs, Micrixalus kottigeharensis.
Source : Times of India
भारत के पश्चिमी जंगलो से "Dancing Frog" (नृत्य करनेवाले मेढक) की एक जाति मिली है। इस जाति के 14 मेढक मिले है।

"Dancing Frog" जाति के नर प्रणय मिलन के समय अपने पैरो को उपर-नीचे करते हुए अजीब सा नृत्य करता है। ये जाति के मेढक बहोत छोटे होते है। उनकी लंबाई 13-35 मिलीमीटर (एक मक्खि जितना !!) जितनी ही होती है। प्रो. सत्यभामा दास बिजु (मुख खोजकर्ता, दिल्ही युनिवर्सिटी) के नेतृत्व में "Dancing Frog" की खोज पीछले एक दशक से पश्विम घाट की पर्वतमाला में हो रही थी।
Dancing Frog
प्रो. सत्यभामादास बिजु इस मेढक की बारे में कहते है-,
" तेज बहने वाले झरने, Dancing Frog का बहुत छोटा कद- कारणों से यह मेढक जल्दी से नजर नहीं आ सकते ।यह जाति के नर मेढक प्रणय मिलन के समय अपना पिछला पैर उठाके हवामें लहराता है। इस जाति की मादा का बर्ताव भी अजीब पाया गया है। वो अपने अंडे उथले पानी के एक गढ्ढे में रख के उपर मिट्टी और पथ्थर ढँक देती है।"
Dancing Frog के DNA से पता चलता है की इनका अस्तित्व डाईनासोर के जमाने से भारत में है।
प्रो. सत्यभामा दास बिजु आगे कहते है-,
प्रो. सत्यभामादास बिजु
"जंगल में झरने के बहते पानी के तेज शोर की वजह से इन मेढको ने मादा को आकर्षित करने का यह तरीका ईजाद किया होगा। लेकिन मादा का अपने अंडो को रखने के लिए घोसला बनाना (गढ्ढा बनाना) अजीब बर्ताव है।"

प्रो. सत्यभामादास बिजु भारत के "मेढक मेन" (Frog man of India) नाम से जाने जाते है। उनके नाम कई खोजें दर्ज है। जिनमें "Purple Frog" (बैंगनी मेढ्क) भी है।
उनका मानना है की पर्यावरण में परिवर्तन और आवास की कमी के कारण Dancing Frog की जाति अब नाशप्राय: हो रही है।

शायद, इस जाति का पृथ्वी पर  यह आखरी नृत्य हो सकता है !!!!

Wednesday, 14 May 2014

IPR,GANDHINAGAR (INDIA) का उर्जा क्षेत्र में वैश्विक और एतिहासिक योगदान

Source : Times Of India
लगता है, ऊर्जा का भविष्य "गुजरात" की कोख में पल रहा है !!

IPR, Gandhinagar
गांधीनगर के नजदिक स्थित IPR (इन्स्टियूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च) के वैज्ञानिको ने विश्व के हृदय समान प्रोजेक्ट, ITER (इन्टरनेशनल थर्मोन्युक्लियर ऐक्सप्रिमेन्ट रिएक्टर, Tokamak Reactor in France) में अपना सहयोग दीया है। ये वैज्ञानिक सहयोग से बनाने वाला विश्व का सबसे बडा रिएक्टर है। इस प्रोजेक्टकी मदद से भविष्य में थर्मोन्युक्लियर फ्युजन प्रकिया (परमाणुकेन्द्र संलयन, सूर्य और तारों में होनेवाली प्रक्रिया)से सस्ती, प्रदुषणमुक्त और सलामत उर्जा पेदा हो सकेगी।
भारत,  ITER में क्रायोस्टेट के 45 घटक और वेक्युम पात्र बनाकर पहुंचाने वाला है। जो इस प्रोजेक्ट के सबसे महत्वपूर्ण और बडे घटक (components) है। ये यंत्र सामग्री 2015 तक ITER, फ्रांस में पहुँच जायेगी। 2022-25 तक इस प्लांट में प्लाज्मा बन जाएगा और इसके बाद के समय में इस रिएक्टर (भठ्ठी) में हमारे सूर्य से 10 गुना ज्यादा तापमान पेदा हो जाएगा ।
Tokamak fusion reactor
Cadarache,France.

Diagram
Tokamak fusion reactor



भारत की महत्वपूर्ण उपल्ब्धि:-

अब भारत क्रायोजेनिक रिएक्टर के निर्माण करने वालें देशों में सामिल हो गया है। इस प्रोजेक्ट में सामिल Made in India रिएक्टर का वजन 23000 टन ( 3 एफिल टावर 
जितना !!!) है और इस में 840 क्युबिक मिटर  प्लाज्मा समा सकता है। डॉ. होमी भाभा, डॉ. विक्रम साराभाई, डॉ. अब्दुल कलाम का सपना अब साकार बनता नजर आ रहा है।



IPR का SST-1 काम कैसे करता है ?


इस रिएक्टर में चुंबकीय और विद्युतीय क्षेत्र की मदद से हाइड्रोजन प्लाज्मा को गरम किया जाता है। फिर अतिवाहक चुंंबक (super conducting magnet) से दबा कर हाइड्रोजन
प्लाज्मा में थर्मोन्युक्लियर फ्युजन प्रकिया (परमाणुकेन्द्र संलयन) शुरु की जाती है।

HAPPY MOTHER'S DAY : मधर डॅ का इतिहास जाने

मधर डॅ का इतिहास :- प्राचीन समय में ग्रीकवासी क्रोनस की पत्नी और समग्र देवताओं की माता "रिहा" (Rhea)‌ को आदर देने के लिए मधर ड...